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श्रावणमास व नागपंचमी निमित्त मिता नानवटकर यांची कविता वाचुया " झोका"

 


                  झोका......


धुंद    श्रावण  महिना

हर्ष  उल्हास   देखणा

सण  पंचमीचा   येता

झोका  चढतो  गगना

गाठ   यशाची  पेलते

उंच  स्वप्नांची डहाळी

दोर   संयमाचा  हाती

रेघ  आशेची कपाळी

ओढ   अनाम  अंतरी

दोन  पायांना  उभारी

मागे   ढकलून  माती

वाजे वाऱ्याची तुतारी

दुष्ट    हेलकावे   जरी

बाह्य  संकटांचे   सारे

आंतरिक    आनंदाचे

बंद   मुठीत    सितारे

मनं   हलके   फुलके

देह       अहंकारशून्य   

रितं   होता   सर्वोपरी

जीव  वाटतो हा धन्य

दु:ख,   वेदना,  विरह

रीत  जुनीच   जीवनी

समाधानी प्राजक्ताचा

बांधू   बंगला   नयनी

समतोल    विचारांचा

झोका सभ्य वर्तनाचा

मोठेपण     विसरूनी

बालपण   जगण्याचा

रोमरोम   आज   गाई

नवं  जन्माचा सोहळा

मखमली   कवितांचा

जणू  पाऊस कोवळा


मीता अशोक नानवटकर

सावनेर,नागपूर.

9823219083.

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